क्या लिखूं कुच्छ लिखनें का मन नहीं करता।


क्या लिखूं कुच्छ लिखनें का मन नहीं करता।
याद है वो सब पुरानी यादें बस समेटने का मन नहीं करता।।
कैसे भूल जाऊं उन्हें जिनने हर बार धोके दिए हैं।
बस उन्हें सजा देना का मन नहीं करता।।
खुद ही जहर पी लेता हूँ जिन्दगी के।
अब किसी से कहने का मन नहीं करता।।
इस साल की आखरी कविता लिख रहा हूँ।
अब आगे लिखनें का मन नहीं करता।।
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मेरी थोड़ी बहुत कविताएँ ब्लोगस्पोट पर मिल जाएंगी- http://manoj-armaan.blogspot.in/?m=0
धन्यवाद सभी मित्रों का जिन्होंने मेरी कविताएँ पसंद की.
       ""मनोज कुमाउनी""

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