*जीवन* *अनमोल* *है*
*जीवन* *अनमोल* *है*
सुख-दुःख तो जीवन के साथी है।
जीवन एक दीया तो एक बाती है।।
हम तुम तो जन्मों जन्म के साथी है।
फिर किस बात की ये दूरी है किस बात की नज़दीकी है।।
ये कुदरत का नज़राना है।
कहाँ किसी का आना है कहाँ किसी का जाना है।।
बस जीवन मृत्यु का बहाना है।
एक दिन यहाँ सभी को छोड़ के जाना है।।
जब तक दुनिया मे जीना है।
तब तक जहर और अमृत एक समान पीना है।।
सुख-दुःख तो जीवन के साथी है।
एक का आना तो एक का जाना है।।
हार जीत तो मुक़द्दर का खेल है।
कोई जीत कर भी हार जाता है।।
कोई हार कर भी जीत जाता है।
मिलता उसी को जो सब कुच्छ सह जाता है।।
जिसने जीवन मृत्यु का खेल रचा है।
वो विधाता ऊपर बैठे सबको देख रहा है।।
शिक्षा दी उसने इंसानों को जिस कर्म की।
इंसानों ने अपना कर्म धर्म अपने हाथों से अगल कर चुका है।।
एक दिन दुनिया को छोड़ जाना है।
फिर किस बात का घमंड दिखाना है।।
रह जाएगा सब कुछ यहीं पे करनी धरनी।
फिर किस बात को आगे ले जाना है।।
जाएगा कर्म धर्म सिर्फ साथ मे।
और क्या ले जाना इस संसार से।।
खाली हाथ आये थे खाली हाथ जाना है।
फिर क्यों छः फुट कफ़न के लिए आपस मे लड़ के जाना है।।
सुख-दुःख तो जीवन के साथी है।
जीवन एक दीया तो एक बाती है।।
और कविताएँ पड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें- http://manoj-armaan.blogspot.in/?m=0
रचनाकार- ***मनोज कुमाउनी***
Comments
Post a Comment